किसी व्यक्ति का देवलोक गमन या श्रीजी शरण हो जाना कोई नई बात नहीं है जो व्यक्ति इस धरती पर आया है वह अपना एक ना एक दिन शरीर को त्याग ही देता है और हम उसे अग्नि में विसर्जित कर देते हैं इस दुनिया में कई लोग आते हैं और कई लोग जाते हैं लेकिन कुछ ऐसे व्यक्ति आते हैं जो इतिहास लिख जाते हैं ऐसा ही एक शख्स जो ईश्वर चारभुजानाथ की कृृपा से मैं उनकी सेवा तो नहीं कर सकी लेकिन उनकी धर्मपत्नी की सेवा जरूर की जो रिश्ते में मेरी सास लगती थी |
बरसों तक मै उनके किस्से सुनती रही | बचपन में उन्हें देखा भी कामदेव जैसा सुंदर व्यक्ति हमेशा काली पैंट व सफेद शर्ट लेडिस साइकिल आगे फलों की टोकरी रोज सुबह ताजे फल और सब्जी घर लाना अक्सर मैं उन्हें देखा करती थी |जब उनका स्वर्गवास हुआ तो मेरा रिश्ता नहीं हुआ था उनका स्वर्गवास 10 जुलाई सन् 1970 में हुआ और मेरा रिश्ता सन् 1975 में हुआ | मैं पुरोहित परिवार की बहू सन् 1975 में बनी शायद उनकी सेवा करने का सौभाग्य मेरे तकदीर में नहीं था | लेकिन आज हम देखते हैं कि 50 साल बाद भी हमारा परिवार उनको भूल नहीं पाया | हमारा परिवार 50 साल से इस पवित्र आत्मा के लिए उनकी याद को जिंदा रखने के लिए हमेशा प्रयास करता है | हम किसी व्यक्ति या संस्था पर एहसान नहीं करते हैं आज सेेेे 75 साल पहले समाचार पत्र निकालना कितना कठिन कार्य था |उनके साथी बताते है कि एक बार की पत्रिका जो निशुल्क प्रकाशित होती थी वह ₹230 में छपती थी जबकि सोने का भाव ₹180 प्रति 10 ग्राम था | यह उनकी स्वयं की प्रतिष्ठा की बात हो या स्वयं का शौक हो , समाज के लिए कुुुछ कर गुजरने की तमन्ना हो या एक सनक हो पर एक व्यक्ति वर्षों तक एक तोला सोना समाज केे लिए खर्च करता है ऐसे व्यक्ति को आप कुछ भी कह सकते हो लेकिन हम तो दीवाना ही कहेंगे | समाज के लिए कुछ कर गुजरने वाले ईश्वर के घर गए इस पवित्र आत्मा को आज 50 वर्ष हो गए है मानो जैसे कल की ही बात हो | लाख कोशिशें की लेकिन हम इस आत्मा को भूल नहीं पाए यह खबर जब आप पढ़ रहेे होंगे तब स्व. गणेशचंद्र पुरोहित के स्वर्गवास को 50 वर्ष हो गए होंगे | यह पालीवाल समाज के प्रथम पत्रकार थे | उनकेेेे कुछ चंद साथी आज भी जीवित है उन्हें याद करते हैं उनकी चर्चा करते हैं उन्हें दीवाना कहते हैं | मैं उनके लिए चंद शब्द इसलिए लिख रही हूं क्योंकि 50वीं पुण्यतिथि होना और उन्हें याद करना कोई मामूली बात नहीं है | स्वर्गीय गणेश चंद्र पुरोहित को याद कर करके आंसू बहाने वाले मैं इस परिवार की बहू हूंं यह मेरा सौभाग्य है | मैं घमंड से कहती हूं कि मैं स्वर्गीय गणेशचंद्र पुरोहित के घर की बहू हूं और अंतिम सांस तक इस पवित्र आत्मा को प्रणाम करती रहूंगी |